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आखिरी तक दौड़ की कहानी

पहले आना एक खुशी है। आखिर तक पहुँचना दूसरी।

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हाय Aavya। मैदान में सीटी बजी। कई बच्चे आगे निकल गए। Aavya की साँस तेज़ हो गई, घुटने भारी लगे। एक ख़याल आया, यहीं रुक जाऊँ, कोई देखेगा नहीं। क्यों रुकने का मन हुआ? क्योंकि आखिरी आने पर शर्म लगती है, और शर्म कदमों को छोटा कर देती है। Aavya ने किनारे देखा। अध्यापिका हाथ हिला रही थी, रुको मत। Aavya ने एक और कदम रखा। फिर एक। लाइन टूटी नहीं। आखिरी बच्चे के रूप में Aavya फीते के पार आया। साँस धौंकनी जैसी थी, पर मुँह हँस रहा था। अध्यापिका बोलीं, तुम रुके नहीं। Aavya, पहले आना एक खुशी है। आखिर तक पहुँचना दूसरी, और वह तुम्हारे पैरों में रहती है।

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