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टूटे गिलास की कहानी

सच बोलने पर गिलास नहीं जुड़ता। भरोसा जुड़ता है, और फर्श सुरक्षित हो जाता है।

अगलीरोज़ पानी
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हाय Aavya। पानी का गिलास हाथ से फिसला और फर्श पर चटक गया। टुकड़े चमक रहे थे। Aavya का दिल तेज़ हो गया। पहले ख़याल यही था, कोई देखे नहीं, तो मैं चुप रहूँ। क्यों? क्योंकि डाँट से डर लगता है। Aavya ने पैर से टुकड़े को डेस्क के नीचे सरकाया। तभी पानी और फैल गया, और राहुल का जूता फिसलने लगा। अगर वह गिरता, तो काँच और भी बिखरता। Aavya ने हाथ उठाया। अध्यापिका, यह मेरे हाथ से गिरा। अध्यापिका डाँटी नहीं। कपड़ा दिया। दोनों ने पानी पोंछा, टुकड़े अख़बार में समेटे। गिलास टूटा रहा। कमरा साफ हो गया, और Aavya की साँस सामान्य हो गई। Aavya, सच काँच नहीं जोड़ता। वह किसी और के पैर को काँच से बचा लेता है।

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