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पौधे को रोज़ पानी

मेहनत एक दिन का शोर नहीं। रोज़ का छोटा काम है।

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हाय Aavya। गमले में एक छोटा पौधा था, पत्तियाँ नीचे की तरफ़। Aavya को लगा, यह प्यासा है, तो आज ही पूरा जग उड़ेल दूँ। पानी किनारे से बह निकला। पौधा और झुक गया, जैसे नहाने के बाद कोई खड़ा न हो पाए। क्यों ऐसा हुआ? क्योंकि जड़ें एक साथ इतना पानी पी नहीं सकतीं। मिट्टी कीचड़ बन गई। अध्यापिका ने कहा, रोज़ आधा कप, सुबह, जब तुम कॉपी निकालो। Aavya ने जग हटा दिया। अगले दिन आधा कप। फिर आधा कप। सातवें दिन एक नई पत्ती मुड़ी हुई सी खुली, हरी और छोटी। Aavya हँसा। Aavya, बड़ा इनाम अक्सर एक दिन की बाढ़ से नहीं, रोज़ की चुस्की से आता है।

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