हाय Aavya। संक्रांति पर पूरा आसमान पतंगों से भरा था। Aavya की लाल पतंग ऊँची उड़ी, फिर झुकी, और नीम के पेड़ में अटक गई। Aavya ने डोर ज़ोर से खींची। खिंच, खिंच। कुछ नहीं। Aavya का मन हुआ और ज़ोर से खींचे। तभी दादाजी ने इशारा किया। डाल पर, ठीक डोर के पास, एक छोटी गौरैया बैठी थी। क्यों रुकें? क्योंकि कसकर खिंची डोर चिड़िया का पंख काट सकती है। Aavya ने डोर ढीली छोड़ दी। दादाजी ने एक लंबा बाँस लिया और धीरे से डोर को डाल से उठाया। गौरैया सुरक्षित उड़ गई, और पतंग फिसलकर Aavya के हाथों में आ गई, थोड़ी फटी हुई। दादाजी बोले, अगली बार सादा सूती धागा, काँच वाला तेज़ माँझा नहीं। फिर दोनों ने छत पर तिल के लड्डू खाए। Aavya, पतंग इंतज़ार कर सकती है। चिड़िया का पंख इतनी आसानी से नहीं जुड़ता।
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त्योहार पर बच्चों को कौन सी कहानी सुनाएँ?
जो त्योहार पास है, उसी से शुरू करें। अक्टूबर में दुर्गा पूजा और दशहरा, फिर दिवाली और भाई दूज।
ये कहानियाँ क्या सिखाती हैं?
भीड़ में खो जाने पर रुकना, डर लगे तो हाथ पकड़ना, जानवरों से नरमी, बाँटना, और पड़ोसियों के त्योहार में शामिल होना।
क्या बच्चे का नाम कहीं सेव होता है?
नहीं। नाम सिर्फ इसी पेज की कहानी में दिखता है और आवाज़ बनाने के लिए जाता है। यह लिंक, कुकी या रिकॉर्ड में नहीं रहता।